मै और हम – अनु महेश्वरी

“हम” से जब “मैं” हुए
अपनों को भी भूल गए
अहम ने जेहन पे कब्ज़ा कर लिया
अपनों से भी मुह फेर लिया
सोच भी संकुचित होती
“मैं” में ही रम जाती
फिर भी एक उम्मीद दिल में रहती
लौट के आने की फिर से
आखिर सुबह घरौंदे से निकले पक्षी
लौट आते शाम ढलने से
यही आशा जीवन है
जीवन में यही उम्मीद है
“मैं” “हम” हो जाएंगे फिर से
खिलखिलाती हंसी गूंजेगी आँगन में
हलकी सी मुस्कराहट खिलेगी सबके चेहरे पे
थमी ज़िन्दगी दौर पड़ेगी फिर से।

 
अनु महेश्वरी
चेन्नई

14 Comments

  1. babucm babucm 20/01/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 20/01/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 20/01/2017
  2. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 20/01/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 20/01/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/01/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 20/01/2017
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/01/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 20/01/2017
  5. sumit jain sumit jain 21/01/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 21/01/2017
  6. Madhu tiwari Madhu tiwari 21/01/2017
    • ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 21/01/2017

Leave a Reply