प्रिय अब तुम वापस आ जाओ

प्रिये अब तुम वापस आ जाओ
प्रिये अब तुम वापस आ जाओ

रूठ चुकी अब बहुत तुम मुझसे नाराजी को ख़त्म करो
सूनी पड़ी है बाहें मेरी तुम मुझ पर एहसान करो
सिमट रहा है मेरा दीपक चलती तेज हवाओं में
जलता रहे ये दीपक मेरा तुम प्रेरणा स्रोत बन जाओ
प्रिये अब तुम वापस आ जाओ

मन मेरा बहुत चंचल है आवारा एक बादल है
नजर न लग जाये किसी की तू ही मेरा काजल है
दुश्मन दिखते है मुझको सब कोई न प्यारा लगता है
प्यार सकूँ में बाट सभी को इतना प्यार तुम दे जाओ
प्रिये अब तुम वापस आ जाओ

आगे बढ़ने की कोशिश करता हूँ तेरी याद आ जाती है
तेरे साथ बिताये पलों की तसवीरें छा जाती है
मेरे भविष्य तुम्हारे हाथों तुम ही हो इसकी निर्णायक
मेरी सफलता में साथी तुम ऐसा वचन तुम दे जाओ
प्रिये अब तुम वापस आ जाओ

प्यार में कमीं न होगी कभी भी मैं तुमको देता हूँ वचन
जो भी तुमको कष्ट मिलेंगे उनको भी सेहता हूँ सजन
तनहा न होगी ज़िन्दगी में ऐसा मेरा साथ है
तुम तो बस आकर के मेरी कश्ती पार लगा जाओ
प्रिये अब तुम वापस आ जाओ

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

2 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 19/01/2017

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