मौत का दामन थामा

खुशियों के माहौल में जन्मा
हर कोई मुझे खिलाया
सबकी चाहत बन जाता
कभी रोता तो कभी हस्ता
फिर उसी में रम जाता
माँ कि लोरिया सुनते
मेरा बचपन यु ही गुजर जाता
जब से जन्मा
तब से मैंने मौत का दामन थामा

गर्व से इठलाता, यौवन पर
न जाने समझता समझदार
चंद रुपयों की चाह में
ईमान लगाता दाँव पर
यहाँ रिश्ते बनते बिगड़ते है
फस गया रिश्तों के जाल में
आख मिचौली करता, खुद से
उलझ कर रह गया माया जाल में
यह जवानी बीती जाती
जब से जन्मा
तब से मेने मौत का दामन थामा

हाथ जोड़, में खड़ा शांत मन से
जीवन बीत रहा है यादों से
धुंधली है यादें
मस्तिष्क थक चुका
कमर झुक गई है
बुढ़ापा खड़ा सामने
यही लाचारी, यही नियति है
मनो माहौल बदल सा गया है
जब में जन्मा
तब से मेने मौत का दामन थामा

मैं क्यों भूल जाता
में जन्मा, बिछड़ ने के लिए
ये रिश्ते नाते छलावा है
न शरीर तुम्हारा, न तुम शरीर के
में क्यों नहीं समझता
मौत सत्य है जीवन का
जब से में जन्मा
तब से मेने मौत का दामन थामा

एक सत्य है इसके अलावा
में सिर्फ और सिर्फ आत्मा हु
मे भिन्न हु जन्म मरण से
मे आत्मा मात्र आत्मा हु
और कुछ नहीं………..
और कुछ नहीं………..

3 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 16/01/2017
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/01/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 16/01/2017

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