क्यों न कहूँ तेरे नैनों को……

क्यों न कहूँ तेरे नैनों को झील मैं
क्यों तुझे देखे बगैर होता हूँ बेचैन मैं
तुझसे लगी है दिल इस कदर
तेरी यादों में झूमता हूँ इस कदर
समां गई हो मेरे दिल में इस कदर
जैसे सुकुनो चैन आके रूकती हो
तेरे ही दर

सिवा तुम्हारे दिल को नहीं किसी की दरकार
ऐ मेरे हम-नफ़स, ऐ मेरे सरकार
तेरे स्पर्श में अदभुत एहसास है
जैसे एक पल उम्र भर का साथ है
जैसे संगीत की साज है
जैसे कोयल की आवाज है
जैसे चांदनी रात है
जैसे तेरा हँसना जिंदगी है
जैसे तेरा रोना मौत है
जब एहसास है इस कदर
क्यों न देखे बगैर होऊं बेचैन मैं
क्यों न कहूं तेरे नैनो को झील मैं

3 Comments

  1. sumit jain sumit jain 13/01/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 13/01/2017
  3. babucm babucm 14/01/2017

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