कहाँ आ गए हैं

मत छीनो ये बचपन
न मालूम कब बीत जायेगा
भूल गए है खेलकूद
न मालूम कब खेल पायेगा
फस गया है इछाओ के भवर में
न मालूम कब निकल पायेगा
मत थोपो हसरते उनके कंधो पर
थक गया है यह बचपन
न मालूम कब सम्भल पायेगा
यदि ये बचपन बिगड़ गया
न मालूम कब सवर पायेगा
कहा चला गया है बचपन
कहाँ आ गए हैं

यह युग है टेक्नोलॉजी का
इन्टरनेट ने किया अचंभित
मच गया कोहराम
बच्चे-युवा हुए दीवाने
ये आगाज है नए विश्व का
बन गए है गुलाम
वे अनजान है इस विश्व से
न जाने कब से
रोक लो उन्हें
थामलो उनका हाथ
ये इंटरनेट कहीं ले न डूबे…!
कहाँ आ गए हैं

क्यों भूल गया रिश्ते-नाते
न मालूम कब समझेगा
क्यों भाग रहा है पैसे के पीछे
न मालूम इस अंधी दौड़ मे
बीत गई ज़िंदगी कमाने में
न आएगा पैसा काम
अभी भी वक्त है तू समलजा
कही ये तुझे निगल ना जाये
कहाँ आ गए हैं

निकले है सफ़र पर कब से
ना मंजिल का ना घर का पता है
न मालूम यह सफर कब थमेगा
क्यों भाग रहा है बंद आखो से
क्यों है विश्वास स्वयं पर
क्यों भुल जाता है स्व को
न मालूम कब जान पायेगा
भय है जैसे मौत का
न मालूम कब थम जाये
कहाँ से सफ़र शरू हुआ था
कहाँ आ गए हैं

8 Comments

  1. babucm babucm 13/01/2017
    • sumit jain sumit jain 13/01/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 13/01/2017
    • sumit jain sumit jain 13/01/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 13/01/2017
    • sumit jain sumit jain 13/01/2017
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 13/01/2017
    • sumit jain sumit jain 13/01/2017

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