हैरां हूं:Er. Anand Sagar Pandey,”अनन्य देवरिया”

**********हैरां हूं***********

 

ऐ वक्त ! तेरे बदले हुए दस्तूर पे हैरां हूं,

जो जख्म हुआ नासूर उसी नासूर पे हैरां हूं l

 

 

अब भी भटकता है तेरे कूचे की हवाओं में,

मैं तो फक़त अपने दिल-ए-मजबूर पे हैरां हूं l

 

 

उम्रभर रौशनी बांटी है खुद मोहताज़ रहा है,

मैं मुद्दत से अपनी हस्ती-ए-बेनूर पे हैरां हूं l

 

 

मुझको ला छोड़ दिया है किसी चौराहे पर,

ज़िन्दगी मैं तो दरीचा-ए-मगरूर पे हैरां हूं l

 

 

मैने “सागर” को तहज़ीब में खामोश पढा है लेकिन,

ऐ नयी कश्तियों ! मैं तुम्हारे गुरूर पे हैरां हूं ll

 

     -Er. Anand Sagar Pandey,”अनन्य देवरिया”

आप सभी मित्रों की रचनायें पढकर आनन्दित होता रहता हूं l

कई बार कमेंट देने का प्रयास किया मगर कुछ error दे रहा है l

खैर! पढने का सौभाग्य प्राप्त हो पाता है इसमें भी संतुष्ट हूं l

6 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 12/01/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/01/2017
  3. babucm babucm 13/01/2017
  4. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 13/01/2017
  5. निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 13/01/2017

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