नहीं फुट सकता है अंकुरित बीज

धागा है तो वस्त्र है
आटा है तो रोटी है
प्रेम है तो प्यार है
बीज है तो अंकुरित है
कारण है तो कार्य है
संसार है तो परावर्तन है
कर्म है तो जन्म मरण है
धर्म है तो मोक्ष है
श्रद्धा है तो ईश्वर है
यही तो जिंदगी है
हा जारी रहेगा संसार भ्रमण
अंकुर फूटेगा ही फूटेगा……………

उत्पन्न होगा तभी बीज
जब वह भुना नहीं है,
निर्जीव नहीं है
बेजान नहीं है,
अचेतन नहीं है
कुंठित नहीं है
खोखला नहीं है
अंकुर फूटेगा ही फूटेगा……………

हा नहीं फुट सकता है
जो भुना गया है बीज
अग्नि की ज्वाला में
कर्म की लो में
तपश्चरण धर्म क्रियाओ से
जन्म मरण को जला दिया
कैसे फूटेगा का अंकुर…….
अतएव नहीं फुट सकता !

नहीं आना है संसार में
नहीं चाहिए है नई पर्याय
नहीं अनुभूति है सुख-दुःख
नहीं चक्र है जन्म मरण का
सरे बंधन को त्याग कर
होना है मुक्त स्वयं को स्वयं से
इस मल रूपी कर्म से
प्राप्त करना है मोक्ष को
पुनः नहीं आ सकता संसार में
नहीं फुट सकता है
यह अंकुरित बीज…………..
यह अंकुरित बीज…………..

 

नोट :- इस कविता में कोई कमी हो बताये जरूर……आपका सभी का धन्यवाद…

3 Comments

  1. babucm babucm 05/01/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 05/01/2017
  3. निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 05/01/2017

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