श्रवण कुमार

ऋषि शांतनु का बेटा वह
नाम श्रवण कुमार था
माँ-बाप की खातिर जिसने
कर दिया जीवन कुर्बान था
दृष्टिहीन मात-पिता थे उसके
वही एक सहारा था
माता-पिता की आज्ञा को वो
अपना धर्म समझता था
इक दिन पिता बोले श्रवण से
तीर्थयात्रा की हमारी इच्छा है
पर क्या करे हाय
ये दुर्बल हमारी काया है
सुनकर सबकुछ े श्रवण को
उपाय ध्यान इक आया था
कांवर बनाकर बांस की
उसमे मात-पिता को बैठाया था
कंधे पर रखकर कांवर को
सभी तीर्थो पर उन्हे घुमाया था
विश्राम हेतु अयोध्या जंगल मे
श्रवण ने डेरा डाला था
उसी समय मात-पिता को
प्यास ने बहुत सताया था
उस जंगल के पास ही बहता
सरयु का कल-कल बहाव था
श्रवण ने पानी भरने हेतु
अपना लौटा डुबोया था
संयोगवश दशरथ राजा भी
आखेट खेलने आया था
लौटे की भरने की आवाज ने
हाथी होने का भ्रम दिलाया था
शब्दभेदी बाण चलाया दशरथ ने
मन ही मन इतराया था
अगले ही पल कर्ण मे उनके
किसी का कंपित स्वर आया था
भागकर पहुचे आवाज की ओर
तब श्रवण को तड़पता पाया था
माफ़ी मांगी दशरथ ने तब
बोले गलती से यह पाप कमाया है
अंत मे बोले श्रवण कुमार
अंतिम समय मेरा आया है
गलती नही कोई आपकी
यह सब तो ईश्वर माया है
पास ही जंगल मे प्रिय मेरे
प्यास से व्यथित बैठे है
कृपा होगी मुझ पर बहुत
अगर पानी उन्हे आप पिlलाते है
सुनकर सब कुछ दशरथ की
आंख मे आंसु भर आया था
इतना कहकर प्राण त्याग दिये
पुत्र होने का धर्म निभाया था
मात-पिता के भक्त रूप मे
उसने अपना लौहा मनवाया था

4 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 31/12/2016
  2. babucm babucm 01/01/2017
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/01/2017

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