Poochha nahin parindon se

लगी शाम ढलने
शाम है सुहानी
गूंज रही किलकारी
आसियाने है खाली
निकल रहा वक्त
परिंदो के इंतजार से
हद है प्रतीक्षा की…….
पूछा नहीं परिंदों से…….

कोई तो पूछो उनसे
कोई तो उन्हें कहो
कोई तो दिखाओ रास्ता
उनके आसियाने का
कहीं तिमिर ना हो जाये
कही भटक न जाये
इन मेघो में……..
पूछा नहीं परिंदों से….

क्यों है बंजारो की तरह
क्यों नापते है दूरिया
इस नभ से उस नभ तक
ये समझते जहाँ इनका
ये रहते है अपनी धुन में
ये है अपनी ही मस्ती में
पूछा नहीं परिंदों से….

ना है तालीम उड़ानों की
ना है सीमा, ना है बंधन
ना पराया है कोई
ना घड़ी है करते कैसे
ना है जुगाड़ कल का
ना डर है वक्त का
ना है कोई मज़हब इनका
पूछा नहीं परिंदों से….

कैसे समझते उच्चै आसमानो को
कैस समझते रिश्तो को
कैसे रहते हिल-मिलकर कर
कैसे जानते हवओ के रुख को
कैसे करते अभिव्यक्त भाषा में
कैसे जीते जग में
कोई तो बता दो आसियान इनका…….
कोई तो पूछो उन परिंदों से…………….

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/12/2016
  2. कृष्ण सैनी krishan saini 27/12/2016
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 27/12/2016
  4. sumit jain sumit jain 27/12/2016
  5. babucm babucm 28/12/2016
  6. sumit jain sumit jain 28/12/2016

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