धीरे-धीरे — डी के निवातिया

भोर की चादर से निकलकर
शाम की और बढ़ रही है जिंदगी धीरे धीरे  !
योवन से बिजली सी गरजकर
बरसते बादल सी ढल रही है जिंदगी धीरे धीरे !
खिलती है पुष्प सी महकती है
फिर टूटकर बिखरने लगती है जिंदगी धीरे धीरे !
संभाल सके इसको गिरने से
जुस्तजू में सिमट गए कितने जुगनू धीरे धीरे !!

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!—:: डी के निवातिया::—

19 Comments

  1. आनन्द कुमार ANAND KUMAR 28/12/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/12/2016
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 28/12/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/12/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/12/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/12/2016
  4. C.M. Sharma babucm 29/12/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/12/2016
  5. Madhu tiwari Madhu tiwari 29/12/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/12/2016
  6. mani mani 29/12/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/12/2016
  7. कृष्ण सैनी कृष्ण सैनी 29/12/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/12/2016
  8. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 30/12/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/12/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/12/2016
  9. ogschjw 09/03/2017

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