Meri beti

रात की सड़क के उस पार
हर रोज़ सबेरे
वो आंखे यू खोलती हैं
कि एक नज़्म साँस भर रही हैं, और
एक खयाल को ज़िन्दगी मिल जाए
मुझसे इशारों और आवाज़ों में बात करती है,
उसके हलक से कभी कभी कोई शब्द भीगते हुए,
होटों तक आ तो जाते है
मैं कुछ समझ नहीं पाता मगर
उसे गोद में लिए फिरू तो लगता हैं
किसी ने चंदन घसकर माथे पे मल दी हो
आजकल घुटनों पे रेंगती फिरती हैं घर में
कही कुछ सहारा मिल जाए अगर, फिर
लड़खड़ाते पाव पे खुद को खड़ा देखकर मुस्कुरा देती हैं
आज रात की सड़क वो पार करने को हैं
ये नज़्म अब आंख खोलेगी अपनी

4 Comments

    • Abhishek 26/12/2016
  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/12/2016
    • Abhishek 01/01/2017

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