शबनमी गुलाब

एक रोज़, गुलाब की पंखुड़ी पे,
मुझे वो बैठी मिल ही गयी,
मुस्कुराती सी,झिलमिलाती सी,
अपने ही अक्स में जगमगाती सी,
उस पंखुडी पे,
मुझे वो मिल ही गयी…
कुछ सवाल थे मेरे मन में,
जो उससे मैंने पूछ ही लिए-
क्यों तुम इस गुलाबी अप्सरा के साथ रहती हो,
उसके साथ ज़रा सा वक़्त बिताके,
क्यों वापस लौट जाती हो…
ये जानते हुये भी कि,
वो सूर्य की गरमाहट,
तुम्हें भस्म कर देगी,
तो क्यों तुम हर रोज़,
खुद को तकलीफ़ पहुँचा के,
पंखुड़ी से मिलने आती हो…
कितने ही असन्ख्य काँटों ने,
तुम्हरे तन को छीला होगा,
फ़िर भी तुम क्यों आ जाती हो…
अपनी मोती जैसी चमक से,
पंखुड़ी को भी रोशन कर देती हो,
इतना उपकार, इतनी मुश्किलों से गुज़रके,
क्यों कर देती हो तुम…
मेरे इस प्रश्न पे,
ज़रा सी भावुक होकर ,
मगर ज़रा सम्भलकर,
एक खनकती सी आवाज़ में,
वो बोली-
कैसे भूल जाऊं उसे,
जो है मेरे दिल के इतने करीब,
जिसकी छवि में,
जिसकी खुशबू में,
है मेरा अन्श ,
कैसे ना मिलूँ उससे…
जिसकी शोभा से मैं भी हो उठती हूँ सुसज्जित ,
कैसे प्यार ना करूं उससे…
कुछ क्षणों के लिये उससे,
हर सवेरे,अपने सुख दुख साझा करके,
हँसना और रोना चाहती हूँ…
मगर ओह! कैसी विडम्बना है ये,
सूर्य की वो कान्ति ,
हमें फ़िर अलग कर ही देती है…
दोस्ती निभाने के लिये भी,
चन्द लम्हे ही तो होते हैं,
चार मास बाद तो,
वो लम्हे भी इन्तज़ार में बदल जाते हैं ,
और हम फ़िर बिछड़ जाते हैं…
बस इन्तज़ार करती हूं,
उस शरद ऋतु का,
जो हमें जोड़ कर रखे हुये है…
तब तक मैं भी,
किसी मखमली घने मेघ में,
गुमनाम सी, निद्रा में रहती हूं,
और पंखुड़ी भी,
काँटों के बीच ,
मुस्कुराने का ढोंग करती है…

4 Comments

  1. Ritu dadheech Ritu dadheech 25/12/2016
  2. babucm babucm 25/12/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/12/2016

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