कौन यहाँ?- सोनू सहगम

-: कौन यहाँ ?: :-

जख्मों को हमारे, मरहम लगता, कौन यहाँ ?
जीने की लाठी जो टूट चुकी, जोड़ता, कौन यहाँ ?
गुल खिला,गुलिस्ताँ इक बनाया था हमने,
आज उन सूखे पेड़ों को, सिंचता, कौन यहाँ ?

आरमान सारे गवा दिये अपने, जिसको बनाने में ।
वो महफिलें,रंगरलियाँ मनाता,अपने आरामखाने में ॥
तरस गए दो शब्द प्यार के सुनने को, उनसे
आँखों के सूखे मोती को, देखता , कौन यहाँ ?

हैं जिनके नाम से ऊंची ऊंची इमारतें ।
दिल मे ही कैद रही, थी जो हसरतें ॥
नौकर-चाकर, महाराज, थे जिस घर में,
आज भूखे पेट को निवाला,खिलाता, कौन यहाँ ?

तू जीये हजारों साल, तरक्की दर तरक्की हो ।
दुआ है हमारी, हो बुलंदी,खुशियाँ ही खुशियाँ हो ॥
आज है जिनकी सौकड़ों मिलें,कारखानें, वस्त्रों की
मगर,हमारे तंज़,फटें कपड़ों को, सिता, कौन यहाँ ?
-: सोनू सहगम :-

8 Comments

    • Sonu Sahgam Sonu Sahgam 24/12/2016
  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 24/12/2016
    • Sonu Sahgam Sonu Sahgam 24/12/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/12/2016
    • Sonu Sahgam Sonu Sahgam 29/12/2016
  3. C.M. Sharma babucm 24/12/2016
    • Sonu Sahgam Sonu Sahgam 29/12/2016

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