हितवाणी -4

कोरे कागज दिल पर , प्रेम लकीर खींच
मैली गठरी हुई तेरी , देख नयन  मीच
तन मैल धोयी के , उज्जवल दियो बनाए
मन दर्पण होये कैसे , कुछ तो करो उपाय
वक़्त पहिया चले सदा , देखे ऊंच न नीच
पर निंदा से मन मैला, हुई कीच ही  कीच
मैले मन के मंदिर में , प्रभु को दियो  बिठाय
बेआवाज जब लाठी पड़े , आगे  कौन  सहाय
अग्नि तेरी दौलत की , बुझा न सके कोई और
एक झटका काल का , छिनता अंतिम कौर
समझ सको तो समझ लो , हितवाणी के बोल
स्वर्ण सज़ा तन तेरा, बिकता  फिर  बेमोल
हितेश कुमार शर्मा

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/12/2016
  2. C.M. Sharma babucm 09/12/2016
  3. Hitesh Kumar Sharma Hitesh Kumar Sharma 09/12/2016

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