अल्हड़ बेगाना—डी. के. निवातिया

न जगाओ मेरे जमीर को, मुझे नासमझ नादाँ ही रहने दो !
मैं ठहरा अल्हड़ बेगाना, जो कहे ज़माना बेशक कहने दो !!
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इंसानियत का मोल नही
यंहा जिस्मो की तिज़ारत होती है !
मतलब की है ये दुनिया,
फरेब के दम पर जिन्दा रहती है !
ऊब चूका हूँ दिखावे से, अब भ्रम का पर्दा आँखों पे रहने दो !
न जगाओ मेरे जमीर को, मुझे नासमझ नादाँ ही रहने दो !!
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जो छेड़े बात कर्म धर्म की
उसे यंहा संज्ञा पशु की दी जाती है
झूठ और पाखण्ड बने महान,
अन्यायी को इज्जत बख्शी जाती है
देख दिल के जख्म हरे हो जाते है, जो दबे है दबे हो रहने दो
न जगाओ मेरे जमीर को, मुझे नासमझ नादाँ ही रहने दो !!
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मर चुकी है अब संवेदनाये
इंसान नही अब इंसान रहा
झूठ मूठ का होता दिखावा
न ह्रदय में शोक संताप रहा
मय्यत में भी होता जिक्र व्यापार का, जो होता है अब होने दो
न जगाओ मेरे जमीर को, मुझे नासमझ नादाँ ही रहने दो !!
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जब कह गये थे राम सिया से
कलयुग कुछ ऐसा ही आयेगा
सत्य अहिंसा मजाक बनेगी
झूठ और ढोंग पूजा जायेगा
जब मालूम, है अटल भगवन के वचन, उनको पूरा होने दो !
न जगाओ मेरे जमीर को, मुझे नासमझ नादाँ ही रहने दो !!
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डी. के. निवातिया _____________@@@

16 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/12/2016
    • निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 24/12/2016
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 21/12/2016
    • निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 24/12/2016
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 21/12/2016
    • निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 24/12/2016
  4. babucm babucm 22/12/2016
    • निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 24/12/2016
  5. Vivek Sharma vivekbijnori 22/12/2016
    • निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 24/12/2016
    • निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 24/12/2016
  6. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 22/12/2016
    • निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 24/12/2016
  7. आलोक पान्डेय आलोक पान्डेय 22/12/2016
    • निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 24/12/2016

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