उत्सव……….मनिंदर सिंह “मनी”

आते रहे, जाते रहे हर बरस, उत्सव ही उत्सव,
थोड़ा और कमा कर, बाद में मनाऊंगा उत्सव,
जिंदगी गुजरती गयी जादुई कागज़ कमाने में,
हर बार यही सोचा मैंने, फिर मना लूंगा उत्सव,

खुद को खाक कर दिया मैंने, अपनों के लिए,
हर चीज़ कमा ली आज मैंने, अपनों के लिए,,
पर खुद से रहा, हरदम बिलकुल बेखबर सा मैं,
जब भी जिया मैं, जिया तो सिर्फ अपनों के लिए,

पर ये क्या आज अपने ही कर गए मुझको तन्हा,
जरा सा थमा क्या मैं बुढ़ापे में, सब कर गए तन्हा,
जिनके लिए, हर ख़ुशी, हर उत्सव लुटा दिया मैंने,
बूढ़े हो गए हो तुम बाबा, वो अपने ही कर गए तन्हा,

तन्हा बैठ कर सोचता हूँ थोड़ा अपने लिए भी जी लेता,
कभी निकाल वक़्त, खुद के लिए भी थोड़ा सा जी लेता,
गुजरे पलो को वक्त कभी, मुड़ने नहीं देगा अब, ऐ “मनी”
होता ना कोई गम, जिंदगी मैं ख़ुशी का उत्सव मना लेता,

मनिंदर सिंह “मनी”

12 Comments

  1. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 28/11/2016
    • mani mani 29/11/2016
  2. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 28/11/2016
    • mani mani 29/11/2016
  3. C.M. Sharma babucm 29/11/2016
    • mani mani 29/11/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/11/2016
    • mani mani 29/11/2016
  5. vijay kumar Singh 29/11/2016
    • mani mani 29/11/2016
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/11/2016
    • mani mani 02/12/2016

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