मजदूर………मनिंदर सिंह “मनी”

किसी का बाप, बेटा, पति, बन,
कुछ कमाने, घर से निकाला हूँ,,
शाम को जल जाये चूल्हा घर में,
सोच कर मैं, घर से निकला हूँ,,

पुराने से कपडे है शरीर पर मेरे,
उधड़ी सी चट्टी डाल निकला हूँ,,
कल की उतार थकावट सारी,
मुस्कुराकर काम पर निकला हूँ,

रोज जमी खोद कर पीता हूँ जल,
मैं अपने दम पर जीने निकला हूँ,
इल्म है मुझे धनी चूसते खून मेरा,
अपने सब्र को आजमाने निकला हूँ,

धुप से दोस्ती, छाँव से है मेरी दूरी,
पसीने की महक मैं, पाने निकला हूँ,,
आ जाये मुझे नींद जमी पर रात को,
ऐसी नींद की चाहत लिए निकला हूँ,,

रोज कमा,रोज खर्च हूँ करता मैं,
सिर्फ कुछ खुशियाँ बचाने निकला हूँ,
बेफिक्र हूँ कुछ खोने के डर से,
बेख़ौफ़ सा हो, राह पे निकला हूँ,

दुर्भाग्य मेरे जीवन में छाया हरदम,
उसे सौभाग्य में बदलने निकला हूँ,,
बस सीधी सी जिंदगी है “मनी” मेरी
मैं अपनों का पेट भरने निकला हूँ,,

फैलाना आता नहीं मुझ को हाथ,
श्रम ही जीवन, सोच ले निकला हूँ,
उठाना है मुझे सारे जग का बोझ,
मैं मजदूर, मजदूर बन निकला हूँ,

मनिंदर सिंह “मनी”

चट्टी—–चप्पल

14 Comments

  1. mani mani 22/11/2016
  2. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 22/11/2016
    • mani mani 23/11/2016
  3. योगेश कुमार 'पवित्रम' योगेश कुमार 'पवित्रम' 22/11/2016
    • mani mani 23/11/2016
  4. Manjusha Manjusha 22/11/2016
    • mani mani 23/11/2016
  5. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 22/11/2016
    • mani mani 23/11/2016
  6. babucm babucm 23/11/2016
    • mani mani 23/11/2016
  7. निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 23/11/2016
    • mani mani 23/11/2016

Leave a Reply