मैने लिखना छोड़ दिया है:अनन्य

**मैने लिखना छोड़ दिया है:Er Anand Sagar Pandey**

 

“मैने लिखना छोड़ दिया है बासन्ती जज़्बातों को,

प्रियतम की बिरहा में बीती सघन अकेली रातों को,

मुझको मेरे शब्दकोष का दामन मैला लगता है,

जो प्रियतम के गीत कहे वो सावन मैला लगता है,

मन व्याकुल हो उठता है अब पायल की झंकारों से,

मेरा नाता टूट चुका है कविता में श्रृंगारों से,

चूड़ी की खन-खन भी मुझको पीड़ा बोध कराती है,

कुमकुम-रोली हाथ पकड़कर दूर कहीं ले जाती है,

वहां उजड़ी मांगें, लथपथ लाशें, खाली मां का दामन है,

जीवन सूना, सूना घर है, सूना घर का आंगन है,

वहां स्वाभिमान क्षत-विक्षत पड़ा है, सच को बस दुत्कारें हैं,

वहां कांटो वाला बिस्तर है और पीड़ा की चीत्कारें हैं,

वहां जख्मी भारत के घावों को देख-देख घबराता हूं,

मैं मरते लोकतंत्र की चीखें साफ़-साफ़ सुन पाता हूं,

वहां संविधान के मन का सारा कष्ट दिखायी देता है,

जब सारे का सारा system भ्रष्ट दिखायी देता है,

जैसे दानव पनप रहे हों खादी के आचरणों में,

गिद्धों का विचरण दिखता है हंसों के आवरणों में,

संसद की चारदीवारी के भीतर ऐसा अनुशासन है,

जैसे लगभग हर कुर्सी पर दुर्योधन दु:शासन है,

ऐसे खुद से मर्यादा का निराकरण कर डाला है,

जैसे बेटों ने ही मां का चीरहरण कर डाला है,

जब कलम उठाने वाले बाज़ारों में बिकने लगते हैं,

तब मुझको भी दामन पर खून के छींटे दिखने लगते हैं,

तब मेरी कलम मुकर जाती है श्रृंगारों को लिखने से,

और तवायफ़ सी नेता के दरबारों में बिकने से,

कहती है मैं प्रेम-विरह का गान नहीं दे पाऊंगी,

ऐ श्रृंगारों के कवि !तुझको मान नहीं दे पाऊंगी,

मैं सौ-सौ लपटें रखने वाली अग्निगंधा चंदन हूं,

मैं पीड़ा वाले हवन कुण्ड में अश्कों का आवाहन हूं,

मेरा मनोंवेग उठता है ज्वालामुखियों के समकर,

और लावों की नदियां बहती हैं मेरी छाती के अन्दर,

 

इसके बाद कवि के हृदय में क्या परिवर्तन होता है –

 

तब मन से जलते भावों का इक ज्वार निकलने लगता है,

और शब्दों का चोला ओढ़े अंगार निकलने लगता है,

तब व्याकुल मन राष्ट्रप्रेम में दूर कहीं खो जाता है,

और वहीं श्रृंगारों का कवि वीर रसी हो जाता है ll

 

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-Er Anand Sagar Pandey (अनन्य)

 

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4 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 19/11/2016
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 19/11/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/11/2016

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