विछोह का विष- डॉ.विवेक कुमार

कल की तरह आज भी
नहीं नकारता मैं इस सच को कि
होती है कोई-न-कोई वजह
किसी के खुश या उदास होने के…

दुःख और मुश्किलों के अंधकार के बीच
हमेशा ही कौंध जाती थी विश्वास से चमकती
तुम्हारी आँखें और खुश हो जाता था मैं…

यह सच है कि कल तक
सभी बेड़ियों को तोड़कर
लहरों पर मचल कर निकल पड़ता था
मेरी ईच्छाओं-हसरतों की नाव
तुम्हारी स्मृतियों के दस्तक मात्र से…

डसती तो थी तुम्हारी अनुपस्थिति सदैव ही
किसी चोटिल नागिन-सी
किंतु तुम्हारी वापसी की संजीवनी
फूँक जाती थी जान मुझमें हर बार ही…

वर्षों से बाट-जोहते
आज तुम्हारे आने की मनोवांछित खुशी से भी
खुश नहीं हो पा रहा हूँ मैं…

यह सोचकर अशांत हूँ मैं कि
तुम्हारे मिलन के बाद
कैसे पी सकूँगा विछोह का विष…

तेली पाड़ा मार्ग, दुमका-814 101
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित।

10 Comments

  1. babucm babucm 15/11/2016
  2. mani mani 15/11/2016
  3. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 15/11/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/11/2016
  5. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 15/11/2016
  6. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 15/11/2016
  7. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 15/11/2016
  8. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 15/11/2016
  9. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 15/11/2016

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