पूर्ण समर्पण – शिशिर मधुकर

जब रिश्तों में विश्वास ना हो व्यापार हो तेरे मेरे का
तुम ही बोलो कैसे वहाँ पर मान हो हर ईक फेरे का

गैरों को अपना माना और नित मेरा अपमान किया
सपना इस से पूरा ना होगा अपने भाग्य सुनहरे का

कितना भी उन्नति करो पर ना कभी अभिमान करो
हम सबको यही सिखाता है महान पर्व दशहरे का

कौन सा जीवन ऐसा है जिसमें सुख दुःख ना आते
हमें जुल्म को सहना होगा इस बादल बड़े घनेरे का

पूर्ण समर्पण ही जीवन में कुंजी है बस खुशियों की
करके देखो आगाज भी होगा फ़िर से नए सवेरे का

शिशिर मधुकर

8 Comments

    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/11/2016
  1. babucm babucm 14/11/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/11/2016
  2. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 15/11/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/11/2016
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/11/2016

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