मैं इंसान बन रहीं हूँ

जिम्मेदारियों से निपट कर ,
मैं इंसान बन रहीं हूँ ,
जैसी जीने की थी चाहत ,
अब बिंदास जी रही हूँ।

ख्वाहिश थी ये पुरानी ,
पर चली न मेरी मनमानी ,
कुछ काम का था चक्कर ,
कुछ महँगाई से थी टक्कर।

सारे आदर्श लुढ़क गए थे ,
हम राह भटक चुके थे ,
वर्षों की खोई अपनी ,
पहचान बन रही हूँ।

जिम्मेदारियों से निपट कर ,
मैं इंसान बन रहीं हूँ ,
जैसी जीने की थी चाहत ,
अब बिंदास जी रही हूँ।

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/11/2016
    • Manjusha Manjusha 10/11/2016
  2. C.M. Sharma babucm 10/11/2016
    • Manjusha Manjusha 11/11/2016
  3. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 11/11/2016
    • Manjusha Manjusha 11/11/2016

Leave a Reply