कम्पित होती धरती ,और प्रेम हमारा हुंकार भर रहा।

carriage

एक दूजे को मर मिटने को देखो कैसे बीज वो रहा।
पल पल चढ़ते यौवन में हृदय कैसे गंबीर हो रहा।
कैसे देखो लौ दीपक की ऊंचाई तक चढ़ने लगी है।
कैसे कुमुदनी हर रोज सबेरे हद से ज्यादा खिलने लगी है।

रथ जीवन का दुर्गम पथ पर देखो अब रफ़्तार भर रहा।
कम्पित होती धरती ,और प्रेम हमारा हुंकार भर रहा।

अजब प्रवाह से देखो नैना कैसे अपना नीर खो रहा।
एक झलक पाने की खातिर कैसे-कैसे अधीर हो रहा।
प्रेम भवर में जगी आस्था तूफानों से कैसे लड़ने लगी है।
मुझ मांझी की कस्ती बन कर जा देखो किनारे पे लगी है।

विरह में हँसाने कैसे पल पल जैसे ईश्वर अवतार कर रहा।
कम्पित होती धरती ,और प्रेम हमारा हुंकार भर रहा।

मन देखो तुम्हरी सांसों में अटका कैसे अपनी पीर खो रहा।
चंचल कितना था देखो अब तुम में कितना बेख़बर सो रहा।
सांसें जीवन की तुम्हारी देखो कैसे संग संग चलने लगी हैं।
उलझ-उलझ मेरी साँसों में कितना कितना हँसने लगी हैं।

चरम सीमा में आकर देखो ऊंचाई से व्यंग कर रहा।
कम्पित होती धरती ,और प्रेम हमारा हुंकार भर रहा

composed by prem

13 Comments

  1. babucm babucm 06/11/2016
    • premkumarjsmith premkumarjsmith 08/11/2016
  2. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 07/11/2016
    • premkumarjsmith premkumarjsmith 08/11/2016
  3. mani mani 07/11/2016
    • premkumarjsmith premkumarjsmith 08/11/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/11/2016
    • premkumarjsmith premkumarjsmith 19/11/2016
  5. premkumarjsmith premkumarjsmith 08/11/2016
    • premkumarjsmith premkumarjsmith 09/11/2016
  6. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 10/11/2016
  7. premkumarjsmith premkumarjsmith 10/11/2016

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