नज़्म कहाँ रखी है मैंने

मेज़ के ख़ानों में

टेबल पर

रैक पे, अलमारी में
और बुकशेल्फ़ पे

कब से ढूँढ़ रहा हूँ

नई-पुरानी किताबों के

औराक़े-जुनूँ में

खद्दर के कुर्ते की
फटी-फटी जेबों में
ऊँट के चमड़े के बस्ते में
नज़्म कहाँ रखी है मैंने?

पूछता हूँ फिर :
नेरूदा से, एमीचाई से, रिल्के से
अभी-अभी तो रखी थी!
नज़्म को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते ही मिल जाते हैं
क़लम, दवात और कोरे काग़ज़
लेकिन नज़्म
बयाज़े-दिल[1] से ग़ायब है!

शब्दार्थ:

  1. ↑ बयाज़ अर्थात‍ याददाश्त की कॉपी।

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