कौन उसे रो लेता था

कौन उसे रो लेता था
मेरा दुख तो तन्हा था

शाम ढली तो तन्हा पेड़
किसको सदाएँ देता था

हाथ हिलाती थी खिड़की
शाम का आख़िरी तारा था

काँपते बर्गों गुल की तरह
हाल हमारे दिल का था

काग़ज़ पर खिड़की खींची
जिसमें तेरा चेहरा था।

Leave a Reply