सहरा को समंदर बनाने चले हो

खुद अपनी तामीर मिटाने चले हो

सहरा को समंदर बनाने चले हो।

 

बातें करता है ज़माना अब तो

कि तुम अपनी तकदीर मिटाने चले हो

 

सहरा को समंदर बनाने चले हो।

 

आफ्ताब की रोशनी फिकी पड़ गई

तुम हो कि चरागो को बुझाने चले हो

 

सहरा को समंदर बनाने चले हो।

 

गले मिलते ही पीठ में खंजर उतार देते हैं

दुश्मनों से तुम यारी निभाने चले हो

 

सहरा को समंदर बनाने चले हो।

8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/11/2016
    • दीपेश जोशी 02/12/2016
  2. C.M. Sharma babucm 04/11/2016
    • दीपेश जोशी 02/12/2016
  3. Uttam Uttam 04/11/2016
    • दीपेश जोशी 02/12/2016
    • दीपेश जोशी 02/12/2016

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