दौड़

सदियों से चल रही

इक अजीब दौड़ है

छूट जाता है कभी कहीं कुछ

कभी ख़्वाहिशों के दौर  हैं

नहीं थमता यह वक़्त कभी

साँस हर पल चलती है

ख़ुशनुमा होते हैं मंज़र कभी

तो सफ़र सुहाना लगता है

कभी ढूँढते हैं बीते लम्हे तो

ज़िंदगी कोई फसाना  लगता है

है यह सफ़र कुछ ऐसा

नहीं कुछ बेगना लगता है

इक ज़ुनून है यह दौड़ शायद

हर  शख़्स  दीवाना लगता है

होता शमा पे क़ुर्बान

इंसान परवाना लगता है

चल रही है सदियों से दौड़

वजह है क्या हम जानते नहीं

है  चक्रवियुह  रचा यह कैसा

क़ुदरत को पहचानते नहीं

खिलते हैं गुल रोज़ कैसे

भरता है उनमें ख़ुशबू कौन

चहूँ ओर बिखरे हैं रंग हज़ार

फिर भी उसे हम मानते नहीं

बनती है रोज़ इक तस्वीर नई

और बिगड़ जाती है

फिर चलता है जादू  कोई

ख़ुद ही सँवर जाती है

होती है सुबह रोज़

जो शाम में ढल जाती है

करिश्मा है यह जाने कैसा

दौड्ड ज़िंदगी में बदल जाती है

 

14 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 28/10/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 28/10/2016
  2. mani mani 28/10/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 28/10/2016
  3. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 28/10/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 28/10/2016
  4. Kajalsoni 28/10/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 28/10/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 28/10/2016
  5. sarvajit singh sarvajit singh 28/10/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 28/10/2016
  6. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 28/10/2016
  7. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 28/10/2016

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