वियोगी मन

जब से तुमने मुख मोड़ लिया  है,

नेह से बंधन तोड़ लिया है |

बिखर गए हैं मोती माला के,

शब्द खो गए मेरी कविता के |

रसिक ह्रदय का स्वाद छिन गया,

छंद का भाव विभाव छिन गया |

हास रुलाता है मुझको, करुणा पर हँसना आता है |

श्रंगार का मुझको बोध ना रहा, रौद्र, वीर न भाता है |

अलंकार माया से लगते, लय, तुक का भी मोह नहीं |

तपती धूप में पैर हैं जलते, शीतलता रूपी छोह नहीं |

बैठा कागज पर दर्द उकेरने,  कलम दुहाई देती है |

दिल के कवि का क़त्ल हो चूका, बात सुनाई देती है |

                        -विवेक गुप्ता

22 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/10/2016
    • विवेक गुप्ता 27/10/2016
  2. babucm babucm 27/10/2016
    • विवेक गुप्ता 27/10/2016
  3. Kajalsoni 27/10/2016
    • विवेक गुप्ता 27/10/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/10/2016
    • विवेक गुप्ता 27/10/2016
  5. abhiraj singh Chandra 27/10/2016
    • विवेक गुप्ता 27/10/2016
  6. sarvajit singh sarvajit singh 28/10/2016
    • विवेक गुप्ता 03/11/2016
  7. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 28/10/2016
    • विवेक गुप्ता 03/11/2016
  8. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 28/10/2016
    • विवेक गुप्ता 03/11/2016
  9. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 28/10/2016
    • विवेक गुप्ता 03/11/2016
  10. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 28/10/2016
    • विवेक गुप्ता 03/11/2016
    • विवेक गुप्ता 03/11/2016

Leave a Reply