बाल श्रम विभीषिका – धीरेन्द्र

बाल श्रम विभीषिका

बच्चे हैं हम, बच्चों पर तो यू बोझ न रक्खो, रहम करो
जी लें, बढ़ लें, खेलें, पढ़ लें, कृपया कर ऐसा ,जतन करो |

मासूम लकीरें हाथों की, घिस घिस कर अब मिटने को है
सारा दिन हमने काम किया, फिर समझो अब पिटने को हैं |

आंसूओ को तुम ना देख सके, सपनो को भी झकझोरा है
कुछ चंद रुपैय्यों की खातिर, बच्चे तक को ना छोड़ा है |

हम हैं मजबूर के हम छोटे, ना शब्द विरोध के आते हैं
इक आप हैं कि ले हम से काम, भी समझदार कहलाते है |

विद्यालय की शोभा हम हैं, ना भेजो हमको खेतों में
दे दो अवसर अब भी चेतो, ना छोडो धुल और रेतों में |

हैं आज कली, कल फूल बने, फिर ही अच्छे फल बनते है
गर सींचोगे तुम आज हमे, तब ही अच्छे कल बनते है |

-धीरेन्द्र-

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/10/2016
  2. निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 25/10/2016
  3. babucm babucm 25/10/2016

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