उम्मीद

उम्मीद
पुष्प शाख से नीचे आकर जमीं से मिलता रहता है ,
फिर भी जीवन इस त्रिभुवन में निशिदिन चलता रहता है ।
सावन सदा लौटकर आता है जीवन के उपवन में ,
खुशियों का सैलाब उमड़ता है हर सूने आँगन में ।
जिन कदमों ने पथरीलों राहों पर चलना सीख लिया ,
जिन शोलों ने तूफा के आँगन में जलना सीख लिया ।
आशाओं का फूल पहाड़ों पर भी उगता रहता है ————फिर भी जीवन ——-
जीवन के पन्नों को आकार वक़्त पलटता रहता है ,
गम को भुलाकर देखो ए गुलशन भी सँवरता रहता है ।
मेंहदी बनकर आज खुदा मैं दुनियाँ का शृंगार करूँ ,
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की खातिर नई पौध तैयार करूँ ।
जीवन के इस चौराहे पर मिलते और बिछड्ते हैं,
सजती दुल्हन कहीं कहीं पर अपने के शव जलते हैं ।
रोज सुबह मेरी छत आकर शाम से मिलता रहता है । —— फिर भी जीवन——-

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/10/2016
    • satyadeo VISHWAKARMA satyadeo vishwakarma 26/10/2016

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