सरहद

कवि:  शिवदत्त श्रोत्रिय

सरहद, जो खुदा ने बनाई||
मछली की सरहद पानी का किनारा
शेर की सरहद उस जंगल का छोर
पतंग जी सरहद, उसकी डोर ||
हर किसी ने अपनी सरहद जानी
पर इंसान ने किसी की कहाँ मानी||
मछली मर गयी जब उसे पानी से निकाला
शेर का न पूछो, तो पूरा जंगल जला डाला ||
ना जाने कितनी पतंगो की डोर काट दी
ना जाने कितनी सरहदे पार कर दी ||
धीरे-२ खुदा की सारी खुदाई नकार दी
सरहदे बना के बोला दुनिया सवार दी
कुछ सरहदे रंग-रूप की, कुछ जाति-धर्म की
कुछ लिंग-भेद की, कुछ अमीरी ग़रीबी की……
धर्मो के आधार पर, मुल्क बना डाले
अपनो के ही ना जाने कितने घर जला डाले||
भाई ने आगन मे दीवार खीच सरहद बना डाली
चारपाई कैसे बाँटता इसलिए होली मे जला डाली||\
हर तरफ इंसान की बनाई सरहदों का दौर है
ये ग़लती है हमारी, आरोपी नही कोई और है||

13 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. निवातियाँ डी. के. 24/10/2016
  2. babucm babucm 24/10/2016
  3. vijaykr811 vijaykr811 24/10/2016
    • shivdutt 24/10/2016
    • shivdutt 25/10/2016
  4. davendra87 davendra87 24/10/2016
    • shivdutt 24/10/2016
    • shivdutt 25/10/2016
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/10/2016
    • shivdutt 27/10/2016

Leave a Reply