तुम को पाकर मुकम्मल हुए हम खुद को ढूँढना भूल गये।

जिन्दगी में तुम्हारी चाहत की रोशनी हुयी

हम अँधेरो से मिलना भूल गये

तुम ही हो अब मेरी मंजिल का पता

सूनी डगरो पर हम चलना भूल गये

ढूँढती थी आंसमाँ में मोहब्बत का सितारा

तुम जैसा चाँद मिला हम सितारो को निहारना भूल गये

हिलोरे लेती थी मेरी कश्ती जिन्दगी के समुन्दर में

तुम मिले मांझी बनकर हम डगमगाना भूल गये

आँखों से तुम्हारी बफा का दीपक जले

अँधेरी रातो में हम चिराग जलाना भूल गये

गमो के गुलशन में तुम फूल बन मिले

काँटो के दामन में हम फसना भूल गये

मोहब्बत का सावन कुछ ऐसा बरसा

पतझङ की उजङी बहारो से हम मिलना भूल गये

हर घङी तुममें ही कुछ ऐसे उलझे

बेबजह मुकद्दर से हम उलझना भूल गये

संजोया था ख्वाब मुद्दतो तक तेरी खातिर

ख्वाब जब हकीकत बना हम ख्वाब देखना भूल गये

गुम थी बरसो से किसी और जहाँ में

तुम को पाकर मुकम्मल हुए हम खुद को ढूँढना भूल गये।

-आस्था गंगवार 

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/10/2016
  2. C.M. Sharma babucm 24/10/2016
  3. Asthagangwar Asthagangwar 24/10/2016
  4. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 24/10/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 24/10/2016