दिलों की सरहद

दिलों में बनी सरहद को अब मिटाना   होगा
पानी होते खून को फिर खून बनाना होगा
मोहब्बत के लफ्ज जो नफरत की परिभाषा बने
उन्ही लफ्जों को अब अमन की माला में पिरोना होगा
वतन की मिटटी की खुशबु कहीं खो सी रही है
उसी मिटटी का तिलक अब सबके माथे पर लगाना होगा
धुंआ-धुंआ होती दिवाली बहुत मना चुके अब
मोहब्बत का दीया हर दिल में जलाना होगा
गैरों के लिए अपनों को बहुत ठोकर मार ली
बिछुड़े हुओं को फिर पलकों पर बिठाना होगा
जलवों से जिनके रोशन हैं हिन्द की सरहदें
अमन और भाईचारे से मुल्क का कर्ज चुकाना होगा
वक़्त के पहिये में हर कोई यहाँ कुचला गया हितेश
वरना मोहब्बत के जहाँ में नफरत का कहाँ ठिकाना होगा

8 Comments

  1. mani mani 22/10/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/10/2016
  3. babucm babucm 23/10/2016
  4. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 23/10/2016
  5. Hitesh Kumar Sharma Hitesh Kumar Sharma 23/10/2016
  6. Kajalsoni 24/10/2016
  7. Kajalsoni 24/10/2016
    • Hitesh Kumar Sharma Hitesh Kumar Sharma 24/10/2016

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