हर लब्ज ताजा””””””””सविता वर्मा

शाम का वक्त
सुरमई मौसम
सितम्बर का सितम
तुम याद आये।

रहते हैं शहर में
मन है गवई
ठेठ अल्हड़ मन में
असंख्य संवेदनाएं।।

हर लब्ज ताजा
उबलते केतली के पानी सा
ईजाद तर्क की
कविता में ज्यादा।।

मन की गठरी में

शब्दों से खेलती

शब्दों को उकेरती

शब्दों की राधा।।

फेर बेबाक शब्दों का

नाज खुद पर

सही गलत से परे

कहा जायेगा बाधा।।

11 Comments

  1. babucm babucm 20/10/2016
    • Savita Verma 21/10/2016
  2. Manjusha Manjusha 20/10/2016
    • Savita Verma 21/10/2016
  3. mani mani 21/10/2016
    • Savita Verma 21/10/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/10/2016
    • Savita Verma 21/10/2016
  5. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 21/10/2016
  6. davendra87 davendra87 21/10/2016
  7. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/10/2016

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