ग़ज़ल- हुस्न को गुरुर किस बात का है

हुस्न को गुरुर किस बात का है,
ये चाँद भी बस रात का है।
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ये पतझड़ तो मौसम,
अश्क़ों की बरसात का है।
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वो बरसों से खामोश है,
ये भी तरीका इंतकाम का है।
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हमें बदनाम करने वाले,
तू भी शख़्स किस काम का है।
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‘दवे’ उसे पूछना जरूर,
मुद्दा क्या तेरी औकात का है।
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उसे नफ़रत है तो कहती क्यों नहीं,
प्यार भी खेल जज़्बात का है।
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7 Comments

  1. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 18/10/2016
  2. shrija kumari shrija kumari 18/10/2016
  3. babucm babucm 18/10/2016
  4. Manjusha Manjusha 18/10/2016
  5. vinod kumar dave vinod kumar dave 18/10/2016
  6. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/10/2016
  7. vinod kumar dave vinod kumar dave 19/10/2016

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