इंसानियत

इंसानियत

हर तरफ़ क्यों छल है भरा
क्यों फरेब है बिखरा हुआ
कैसी चॉही थी हमने ये दुनियॉ
जाने ये कैसा बन गया
पहले जहॉ बिस्वास था
आज विष का वास है
पहले जो थी मर्यादा
आज वो शब्द परीहास है
करें कैसे किन पर यक़ीन
चेहरे पे छिपे चेहरे कई
कहने के लिए कुछ और है
करने के लिए बातें जुदा
बस्ता नहीं अब प्यार दिलों मे
हर यार यहॉ है मतलब का
ये कैसी बाजार सजी
हो रहें रिश्तों के व्यापार जहॉ
कहने के लिए इंसान है हम
पर पता नहीं इंसानियत का

4 Comments

  1. डॉ. विवेक Dr. Vivek Kumar 17/10/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/10/2016
  3. C.M. Sharma babucm 17/10/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/10/2016

Leave a Reply