तक़दीर

तक़दीर

जिन्दगी हर रोज़ नई
सौगात लिए आती है
फिर नई चोट वो
बेआवाज लिए आती है
कभी मे चैन से बैठूँ
ऐसा हो नहीं सकता
दिले नासाद को हरपल
ये बेजार किए जाती है
अपनो को ऐसे रंग मे
ये सामने लिए आती है
दर्द के अहसास को जो
फिर से बढ़ा जाती है
कभी दिल सोचता है
कैसी ये तक़दीर पाई है
जो दिल के क़रीब थे
उन्ही से चोट खाई है
वफा के बदले मे मिली
हमे बेवफ़ाई है
अब तो हम भी नहीं तन्हा
गमों ने हम से दिल लगाई है
ख़ुशी ये साथ न दे
ग़म साथ तो निभाती है
तभी तो हर दिन वो
एक नई ज़ख़्म लिए आती है
अब तो इतना बता दे
ऐ तक़दीर को लिखने वाले
मेरे गुनाहों की और
कितनी सजा बाकी है ।

3 Comments

  1. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 17/10/2016
  2. C.M. Sharma babucm 17/10/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/10/2016

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