जो कमी तुझमे है मुझमे है

यह जो खो देने का भय है
या फिर कुछ पाने की इच्छा है
ठीक वैसी, जैसी तुझमे है
मुझमे भी है।

मुझसे अलग नही है
यह करुण विलाप
जो तेरे हृदय से उठा है
चक्षु अलग हैं
अश्रुधार वही है
वही पीर सिंधु जो तुझमे है
मुझमे भी है

नही जानता कौन हो तुम
क्या नाम है तुम्हारा
क्या पंथ है क्या जात है
दर्द से उबरने की शक्ति
जैसी तुझमें है
मुझमे भी है।

अविस्मरणीय है
किसी “अस्पताल” में
सत्य का यह साक्षात्कार
स्वयं को समझने में कमी
जैसी तुझमे है
मुझमे भी है।

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/10/2016
  2. babucm babucm 17/10/2016
  3. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 17/10/2016
  4. Kajalsoni 17/10/2016

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