समझ से परे – प्रियंका ‘अलका’

तुम कहते हो
तुम्हें मेरी रचनाएँ
समझ में नहीं आती
फिर भी तुम चाहते हो
मैं हमेशा लिखती रहूँ ……

मैं तुम्हारी बात
समझ सकती हूँ ।

धरा पर आ रही बूंदें
कहीं पत्तों पर हीं
अटकी रह जातीं हैं
धरा बस देखती भर
रह जाती है
वो कुछ समझ नहीं पाती
और बूंदों की प्यास में
जागती रह जाती है। ।

दुनियादारी की चादर ओढ़े
तुम्हारे प्रेम को
मैं कभी भी
समझ नहीं पाती
पर फिर भी
सदैव तुम्हारा साथ
चाहती हूँ ।

क्या कर सकते हैं
कुछ चीजें
समझ से परे
होती हैं

हाँ,
समझ से परे –
तुम्हारे लिए
मेरी रचनाएँ
मेरे लिए
तुम्हारा प्रेम ।।
– अलका

12 Comments

  1. babucm babucm 16/10/2016
    • ALKA ALKA 16/10/2016
  2. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 16/10/2016
    • ALKA ALKA 16/10/2016
  3. Jay Kumar 16/10/2016
    • ALKA ALKA 16/10/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/10/2016
    • ALKA ALKA 18/10/2016
  5. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 17/10/2016
    • ALKA ALKA 18/10/2016
  6. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/10/2016
    • ALKA ALKA 18/10/2016

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