सुरबाला

सुरबाला

प्रज्वलित से नैन थे वो
और खुली हुई सिखा
देख कर वो मानो
लजिज्त हो रही थी
स्वर्ग की भी अप्सरा
सविता कर सिमट रही थी
और कौमुदी फैली वहॉ
देख कर ये दृश्य सारा
चन्द्र भी कुछ खो रहा था
उसके सुघड नैनों से मानो
चन्द्रहास चल रहा था
बोल सारंग सी उसकी थी
मीठे गीत सुन उसके मानो
कानो मे मधुरता घुल रही थी
पलकों के अलसाई अंचल मे
सावन के झूलों मे बैठी वो
भीगी अंबर मे लिपटी मानो
झील सु-नीर मे खिली कमल हो
इंदू सी अनुपम जिसकी आभा थी
चंद्रिका सी दिप्तमान
वो सुरबाला थी

2 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/10/2016
  2. babucm babucm 16/10/2016

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