मानवता

        मानवता

मानवता कही दम तोड़ रही है

दबी सी एक चीख लिए

जिसे सुनने की अब

आदत सी बन गई है

यह तो होता है

हर रोज़ हर कही

कहीं गोलियॉ कहीं बारूद से

कराहती है ये हर वक्त ही

बहस होती है इस पर

कि गलतीयॉ है किसकी

इन ईलजामों के ढेर में

दब गई है सिसकीयॉ जिसकी

कलम घिसते हैं इस पर

मुझ जैसे पर कभी कभी

मुझे सुकून है मेरी कविताओं मे

जुड़ गई एक और कड़ी

बातें करते हैं इस पर

मुझ जैसे कई और भी

पर लगाता नहीं मरहम

देता नहीं दवा कोई ।

3 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 15/10/2016
  2. mani mani 16/10/2016
  3. Markand Dave Markand Dave 16/10/2016

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