जग में तुझ सी माँ ना होगी

मैं चंचल मैं पापी भोगी

जग  में तुझ सी माँ ना होगी ।

दर्शन बिन रोती हैं अंखिया

पूरी कब अभिलाषा होगी ॥

 

मन्त्र न  जानूं , यन्त्र न जानूं,

ध्यान न जानूं, तन्त्र न जानूं ।

तेरी मुद्रायें न जानूं,

व्याकुल हो विलाप ना जानूं।

तेरे पीछे चाहूं चलना

पर अनुचर के गुण न जानूं।

कलेश हरो माँ , अवगुण हर लो

जग में तुझ सी माँ न होगी ॥

 

मैं पूजन अर्चन न जानूं

प्रायश्चित क्रंदन न जानूं।

त्रुटियों की मैं खान हूँ माता ,

ध्यान तुम्हारा ना कर पाता ।

तेरे द्वार नहीं आ पाया ,

लग चरणों से रो न पाया ।

फ़िर भी मुझको तूने सम्भाला

जग में तुझ सी माँ न होगी ॥

 

मंत्र तेरा जो श्रवण करे तो

मूर्ख मधुर वक्ता हो जायें ।

दीन स्वर्ण वैभव पा जायें

भीरू पुरुष निर्भय हो जायें ।

एक मन्त्र का असर है ऐसा

जप तप का फल होगा कैसा ?

मुझको भी स्वीकार करो माँ

जग में तुझ सी माँ न होगी ॥

 

मोक्ष न  माँगू , धन न माँगू

इस जग का वैभव न माँगू ।

तेरा नाम बसे  जीवन में

केवल इतना सा वर माँगू ।

तड़प रहा हूँ बिलख रहा हूँ

भव सागर में भटक रहा हूँ ।

मैं चंचल मैं पापी भोगी

जग में तुझ सी माँ न होगी ॥

 

– दीपक श्रीवास्तव

2 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 15/10/2016
  2. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 15/10/2016

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