कल्पना

चमन मे चॉदनी फैली
लहर भी दौड़ के आई
हजारो ने उसे देखा
कली भी मंद मुस्काई
कौन थी वो परी थी क्या
या कोई अप्सरा थी वो !
यही मैं सोचने बैठा
क्या मेरी कल्पना थी वो
जब मैं सोचने बैठा
वहॉ पर रोशनी छाई
पलट कर मैने जो देखा
वो परी फिर से थी आई
मै उसके सामने पहुँचा
शर्म से वो यूँ मुस्काई
लगा मुझको तब ऐसे
लबों से फूल झड आई
मैं कुछ पूछता उस्से
तभी मै जाग कर बैठा
सबेरा हो चुका था अब
वो मेरी कल्पना थी बस ।

2 Comments

  1. babucm babucm 15/10/2016
    • sunil kumar jaiswal 15/10/2016

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