३२. नही सुने थे वो हमारी ……..|गीत| “मनोज कुमार”

नही सुने थे वो हमारी उसने भी अनसुनी की
वो लौटे ने मौसम लौटा सपनों ने अनसुनी की

हम भी थे खामोश मगर वो चेहरे से ही समझ गयी
भीग गयी सब पलकें मेरी यादों ने जब बारिश की

ऐसी अजब कयामत ढाई जमीं पैर से निकल गयी
नही हुई इनायत उनकी अपनों ने मनमर्जी की

और भला क्या हम समझाते समझाने से रूठ गयी
शरमा के वो मुकर गयी जब आइने के सम्मुख की

प्यार का जैसे नगमा हो वो इतनी प्यारी लग रही
मुझसे पहले कितने आये सबकी ही अनसुनी की

हो जैसे कोई किस्सा वो किस्सा जैसे बन गयी
सुबह शाम हम जिसको सोचें उसने ही अनसुनी की

बेदर्द जमाना है ये तो उसका भी इसमें मोल नही
जीवन है जीवन जीने को समय ने अनसुनी की

“मनोज कुमार”

4 Comments

  1. mani mani 14/10/2016
    • MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 14/10/2016
  2. C.M. Sharma babucm 14/10/2016
    • MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 14/10/2016

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