“रिश्ते ही रिश्ते “

“रिश्ते ही रिश्ते ” यह विज्ञापन रेल से आते जाते ,पुरे
पुरे भारतवर्ष में दीवाल पर छपा हमेशा ही दिख जाता है ,
ऐसा लगता है कि जैसे कि किसी दुकान का विज्ञापन हो ,
जहाँ तरह तरह के आकार और जाति के रिश्ते मिलते हैं।

क्या सचमुच ही ऐसे हालात हो गये हैं,
कि रिश्तों और संस्कार की दुहाई देने वाले भारतवर्ष में ,
आज रिश्ते दुकानों पर भी बिकने लगें हैं,
क्या हुआ उन मामी चाची और बुआंओं का ,
जिनका काम ही रिश्ते जोड़ने का ही हुआ करता था ,
और कभी कभी रिश्ते तोड़ने का भी।

क्या मैँ कुछ गलत बोल रही हूँ या अपनी उपर्लिखित ,
टिपण्णी में ज्यादा ही कटु कह रही हूँ ,तो कृपया ,
मुझे माफ़ कीजियेगा ,मगर आप ही बताईये कि मै,
इस “रिश्ते ही रिश्ते ” विज्ञापन का का क्या अर्थ निकालूँ ?

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/10/2016
    • Manjusha Manjusha 14/10/2016
  2. babucm babucm 15/10/2016
    • Manjusha Manjusha 15/10/2016
  3. mani mani 15/10/2016
    • Manjusha Manjusha 16/10/2016

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