पीर तुम्हारी खेल रही है

पीर तुम्हारी खेल रही है

पीर तुम्हारी खेल रही है
मेरे आँसू के निर्मल जल में।
और व्यथाऐं तेरी सारी
स्याह बनी बस बहती काजल में।

शक्ति मिली ना मुझको तुमसे
बस जीवित हूँ मैं विश्वासों में
तू भी हार चला है जैसे
मेरी बिखरी उजड़ी साँसों में

तुमको रोते देख रहा हूँ
छिप छिप मेरी माँ के आँचल में
पीर तुम्हारी खेल रही है
मेरे आँसू के निर्मल जल में।

चिर परिचित है तेरी पीडा
मचल रही जो मेरे प्राणों में
तेरी चिंता की रेखाएँ
उभर रही हैं बस अभिषापों में

तू ही तो है सिसक रहा जो
मेरी इन आहों के बादल में
पीर तुम्हारी खेल रही है
मेरे आँसू के निर्मल जल में

मुखरित है जो मेरी कहानी
मेरे गीतों के कंपित स्वर में
उस कंपन के जनक बने तुम
बैठे हो बस भ्रम के मंदिर में।

मैं चुप हूँ, पर तू व्याकुल है
उठती आहों के कोलाहल में
पीर तुम्हारी खेल रही है
मेरे आँसू के निर्मल जल में।

… भूपेन्द्र कुमार दवे

5 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 15/10/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/10/2016
  3. mani mani 16/10/2016
  4. Markand Dave Markand Dave 16/10/2016
  5. डॉ. विवेक Dr. Vivek Kumar 16/10/2016

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