मैं चाहूं मेरे गीतों को

मैं चाहूं मेरे गीतों को
तुम अपने सुर में गावो
दिव्य पूर्णता अपने स्वर की
इन गीतों में भर जावो

गाते गाते राग थके जब
मेघों की गर्जन ले आवो
बिखरे सुर जब मन कानन में
उन्हें संजोने तुम गावो

अधखुली पँखुरियाँ गीतों की
छूकर तुम पूर्ण बनावो
मैं चाहूं मेरे गीतों को
तुम अपने सुर में गावो

तेरे विशाल शब्दकोश में
कोरा कागज अर्थ न बूझे
यह गूंगापन मूक अधर का
क्यूं कोलाहल में छिप झूमे

रिक्त पंक्ति में लय भरकर तुम
कुछ राग अनूप सुनावो
मैं चाहूं मेरे गीतों को
तुम अपने सुर में गावो

मूक शब्द भी अर्थ भरे हैं
पर मैं कैसे उनको समझूं
मौन अगर तुम रहना चाहो
तो मैं तुमको कैसे समझूं

तुमने ही तो शब्द रचे हैं
तुम ही अब अर्थ बतावो
मैं चाहूं मेरे गीतों को
तुम अपने सुर में गावो

चिंता की रेखा में अंकित
स्वर लहरी भी कँपती जावे
प्रथम उड़ान के पहले ही
पंख सहित मन भी थक जावे

खत्म न होवे गीत खगों का
कुछ ऐसा गीत सुनावो
मैं चाहूं मेरे गीतों को
तुम अपने सुर में गावो

तुम हो अंतिम स्वर जीवन के
अज्ञात मौन के बोल तुम्हीं
सारा कोलाहल भी तुम हो
अनंत मौन के बोल तुम्हीं

गीतों की सोयी पलकों में
स्वप्न सुनहरे भर जावो
मैं चाहूं मेरे गीतों को
तुम अपने सुर में गावो

मेरा जीवन पथ है सूना
कदमों की आहट भी चुप है
मेरे गीतों की खामोशी
इन सन्नाटों में गुमसुम है

तुम चाहो तो इन गीतों को
तुतलाना ही सिखलावो
मैं चाहूं मेरे गीतों को
तुम अपने सुर में गावो
…. भूपेन्द्र कुमार दवे
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2 Comments

  1. mani mani 28/09/2016

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