फर्जी देशभक्त

अभी एक दो दिन में उपजे फर्जी देशभक्तो की पोल खोलती तथा अपने दायित्व से भटके इन फर्जी देशभक्तो को पाठ पढाती मेरी रचना –

रचनाकार- कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”, इटावा, उ.प्र.
whatsapp – 9675426080

जिस वक़्त फेसबुक पर आकर वो मोदी जी पर ऐंठा था
वो उसी समय जनरल डिब्बे में बिना टिकट के बैठा था
जब ट्रेन देर से आने पर पूरे सिस्टम पर खीजा था
पर उसमें चढ़कर बार-बार वो चैन पकड़कर खींचा था
दो चार सुलगते पोस्ट डालकर फ़िर से फीलिंग क्रेज़ी है
है कभी चिलिंग तो कभी ओव्सम कभी-कभी तो लेजी है
अपनी इस झूटी देशभक्ति का ज्ञान बाँटते रहते हैं
पर नित हत्यारों के घर उनके चरण चाटते रहते हैं
इन वीर सैनिकों की लाशों पर तुमको दुःख अब हुआ चलो
उनके परिवारों के अश्कों ने अंतर्मन को छुआ चलो
पर बतलाओ जब सेनाओं पर दोष लगाए जाते हैं
भारत भू की बर्बादी के जयघोष लगाए जाते हैं
भारत के दुश्मन को भारत में हार पिन्हाए जाते हैं
हत्यारों के घटनाक्रम पर उपहार गिनाए जाते हैं
जब नरसंहार खुले दम से इस भू पर भक्षक करते हैं
जब उनकी पैरवियाँ सारे कानूनी रक्षक करते हैं
जब बलत्कार की घटनाएँ साजिश बतलाई जातीं हैं
कुछ ख़बरंडी से देशद्रोह घटना झुटलाई जातीं हैं
बंगाल, बिहारों में पाकी झंडा लहराया जाता है
जब जाली द्वारा भगवा पर संकट गहराया जाता है
जब धार मालदा जलता है सीवान जलाया जाता है
इन आस्तीन के सर्पों को जब दूध पिलाया जाता है
जब अफजल भारत का बेटा, इशरत बेटी कहलाती है
जब मैंम विदेशी रोकर हृदय बटाला पर बहलाती है
जब मज़हब की दीवारों पर आतंकी कालिख छाती है
जब निर्दोषों की निर्मम हत्याएं नेकी बन जाती है
जब प्रतिभाओं का गला घोटकर गधे पंजीरी खाते हैं
जब आरक्षण की शमशीरों से सीने चीरे जाते हैं
जब घूस खिलाकर अफसर को गदहे नौकरियाँ पाते हैं
जब उन्हीं भ्रष्ट आकाओं के यशगान शौक से गाते हैं
जब इंच-इंच दीवारों पर घर में दंगल हो जाता है
जिसकी लाठी लम्बी ज्यादा उसका मंगल हो जाता है
जब स्वारथ के बस में होकर के खून बहाया जाता है
जब दीनों पर सबके द्वारा ही जुल्म ढहाया जाता है
जब पंच सरीखे परमेश्वर मुँहदेखे निर्णय करते हैं
लालच की थाली जिधर उधर ही अपना परिणय करते हैं
जब वोटबैंक को देख कसाई को राशन बाँटा जाए
जब आजमगढ़ में जाल फिलाकर, प्रेम पाश काटा जाए
जब डायन कहने वाले के सर ताज सुशोभित होता है
कुछ सरदारों द्वारा जब आतंकी पोषित होता है
जब इन सारी घटनाओं पर सबकी चुप्पी छा जाती है
हमको लगता है ये चुप्पी ही देशभक्ति खा जाती है
धीरे-धीरे सबके अंदर का देशभक्त मर जाता है
कितनी आँखें तब रोती हैं किसका सीना भर जाता है
तुम घर में तो सीना ताने गुणगान जाल का करते हो
इन आतंकी घटनाओं पर फ़िर अपनी आँखें भरते हो
ये सरहद के उस पारी से जाली का ही तो शोर बढ़ा
ये काश्मीर तो सिर्फ़ बहाना, मकसद इससे और बड़ा
नेमार याद कर लो थोड़ा उसने क्या था ऐलान किया
हिंदू को यहाँ मिटाएगा ये ही उसने फरमान दिया
आतंकी घर में भी बैठे उनकी चुन-चुन पहचान करो
यदि देशभक्त हो देशभक्ति का पूरा हर अरमान करो
नेताओं को गाली देना ही देशभक्ति होती है क्या ?
अपनी करतूतों किस्से पर भी आँख कभी रोती है क्या ?
दायित्व तुम्हारा तुम भूले तो उनको कैसे याद रहे
उनकी बस सीट सलामत हो ये मुल्क भले बर्बाद रहे
यदि फिक्र देश की सच में है तो तुम्हें कसम उन वीरों की
इस शौर्य सिंधु से उगने वाले पन्ना मोती हीरों की
अपने अंदर का देशभक्त मरने मत दो यदि बूता है
ये “देव” कहे वरना तुम सबके लिए हाथ में जूता है

———–कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/09/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/09/2016

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