ग़जल:”दिल-ए-नादां”

इश्क का दीदार हर किसी को
नसीब नही होता ,
शबाब-ए-हुस्न का ख्वाब
हर किसी का पूरा नहीं होता ।

दिल-ए-नादां तू समझता क्यों नहीं
बिखर चुकी है , मिरी हयात
तू टूटता क्यों नहीं ।

महफूज़ जिसे तूने रखा है अपने भीतर
जसारत से बाहर निकालता क्यों नहीं ।

न मिले वो तुझे , तू ग़म न कर
तू उन्हें , दिल-ए-पत्थर समझता क्यों नहीं ।।
-आनन्द कुमार

*मिरी हयात – मेरी जिन्दगी
* जसारत – दिलेरी

8 Comments

  1. Shishir Madhukar 25/09/2016
    • आनन्द कुमार ANAND KUMAR 26/09/2016
  2. babucm babucm 25/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/09/2016
    • आनन्द कुमार ANAND KUMAR 26/09/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/09/2016
    • आनन्द कुमार ANAND KUMAR 26/09/2016

Leave a Reply