हिंदी…. हूँ मैं (प्रदीप शर्मा का हिंदी भाषा को नमन)

हिंदी हूँ मैं
हिंदी हूँ मैं
मैं भाषा होने की परिभाषा की मोहताज नहीं |
धड़कती हूँ मैं, भारत के ह्रदय में वाणी बन कर,
मेरे आस्तित्व को नियम शर्तों की दरकार नहीं |
हिंदी हूँ मैं….मैं भाषा होने की परिभाषा की मोहताज नहीं |

माह, पखवाड़े, सप्ताह से ही, सिर्फ महिमा नहीं मेरी
मैं पीढ़ियों के श्रम की उपज हूँ, साधको के श्रम का सृजन हूँ |
दिव्यता का चढ़ता सूरज हूँ, मैं उपेक्षाओं की ढलती सांझ नहीं
हिंदी हूँ मैं….मैं भाषा होने की परिभाषा की मोहताज नहीं |

हैं कोटि साधक, सेवक, आराधक, पुरोता, प्रणेता मेरे,
माता मान कर सेवा करते बहुतेरे |
एक छत्र राज, करोड़ों भारतीय कंठों पर,
प्रत्यक्ष का यह प्रमाण, है किसको स्वीकार नहीं |
हिंदी हूँ मैं….मैं भाषा होने की परिभाषा की मोहताज नहीं |

6 Comments

  1. Jiya 24/09/2016
  2. C.M. Sharma babucm 25/09/2016
  3. आनन्द कुमार ANAND KUMAR 25/09/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 25/09/2016
  5. Radhe प्रदीप शर्मा 25/09/2016
  6. Kajalsoni 25/09/2016

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