ये ही तेरे मैकदे का राज खोलते हैं

ये ही तेरे मैकदे का राज खोलते हैं
तेरे हाथ कँपते हैं जब जहर घोलते हैं।

जहराबे-गम को अमृतकणों से जोड़ते हैं
ये सोचनेवाले भी क्या खूब सोचते हैं।

तन्हा रहूँ या भीड़ में खामोश रहता हूँ
इधर सब चुप रहते हैं उधर सब बोलते हैं।

ये कैसी अजब गली में तुम जाके बसे हो
मैं एक खटखटाता हूँ सब दर खोलते हैं।

मैं तो शाखे-जर्द का एक बर्गे-खुश्क हूँ
ये तो फूल हैं जो दिल की तरह काँपते हैं।

हमने दुआ का असर देखा भी तो इस तरह
अश्क मुस्कराते हुए अब जख्म खोलते हैं।

ये वोह फूल नहीं जो हवा में सूखते हैं
जरूर कुछ दिलजले भ्रमर हैं जो कोसते हैं।

ये जहर की तासीर है झाक-सी उठा देना
छलकते जाम को देखो वे भी खौलते हैं।

हम बैठकर खुदा से एक खुदा माँगते हैं
वो हमसे हमीं को खुद आ के माँगते हैं।

हम किसी को भी परवरदिगार मारते नहीं
ये दुष्कर्म हैं हमारे जो हमें मारते हैं।
—– भूपेन्द्र कुमार दवे
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3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/09/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/09/2016

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